Wednesday, May 14, 2014

नई सदी के रंग में ढलकर हम याराना भूल गए
सबने ढूंढ़े अपने रस्ते साथ निभाना भूल गये

शाम ढले इक रोशन चेहरा क्या देखा इन आँखों ने
दिल में जागीं नई उमंगें दर्द पुराना भूल गए

ईद, दशहरा, दीवाली का रंग है फीका-फीका सा
त्योहारों में इक दूजे को गले लगाना भूल गए

वो भी कैसे दीवाने थे ख़ून से चिट्ठी लिखते थे
आज के आशिक़ राहे वफ़ा में जान लुटाना भूल गए

बचपन में हम जिन गलियों की धूल को चंदन कहते थे
बड़े हुए तो उन गलियों में आना-जाना भूल गए

शहर में आकर हमकॊ इतने ख़ुशियों के सामान मिले
घर-आंगन, पीपल, पगडंडी , गाँव सुहाना भूल गए